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Joshimath Badrinath : जोशीमठ का जिम्मेदार कौन, क्या कहानियों में रह जाएगा उत्तराखंड ?

Joshimath Badrinath: दशकों से थरथराती हुई जमीन की आहट को सरकार और जिम्मेदार सुनकर भी अनसुना कर रहे थे पर आज जब जोशीमठ की जमीन पूरी त....

Joshimath: दशकों से थरथराती हुई जमीन की आहट को सरकार और जिम्मेदार सुनकर भी अनसुना कर रहे थे पर आज जब जोशीमठ की जमीन पूरी तरह से थर्रा गई है तो लोग चीख रहे हैं, लोग बेघर हो चुके हैं, घरों में दरार है, लोग लाचार हैं ।

फिलहाल अपने दम पर खड़े हुए घर कभी भी जमींदोज हो सकते हैं पर सवाल यही बना हुआ है कि इस तबाही का आखिर कौन जिम्मेदार है?

भविष्यवाणियां तो यह जरूर बताती हैं कि यह धाम भविष्य में विलुप्त हो जाएगा.

लेकिन इस विलुप्ति के पीछे एनटीपीसी की जलविद्युत परियोजना और आल वैदर सड़क परियोजना हैं

ने विनाशकारी भूमिका निभाई है, जिसका परिणाम आज उत्तराखंड देखने को मजबूर है।

गैर क़ानूनी था निर्माण: Joshimath Badrinath

  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कागजों में निर्माण बंद हो चुके थे.
  • पर लगातार काम चल रहे थे आखिर यह परियोजनाएं किस मक्सद के लिए चल रही थी।
  • एक तरफ लाखों करोड़ों की लागत से बन रही परियोजनाएं उत्तराखंड में पर्यटन और परिवहन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है.
  • पर इस विकास के लिए पर्यावरण को दरकिनार कर दिया गया।

लिहाजा विकास का विनाशकारी हो जाना भी स्वाभाविक हो जाता है इसमें कोई दो राय नहीं है कि बद्रीनाथ धाम ,जोशीमठ जैसे स्थान हिंदू आस्था और भारतीय संस्कृति के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र है यदि लाखों-करोड़ों की परियोजनाएं इन स्थलों के विकास पर खर्च की जा सकती हैं तो क्या विकास के बदले में आई तबाही के मंजर को बदलने के लिए लाखों करोड़ों के प्रोजेक्ट लांच नहीं किए जा सकते हैं,यह बड़ा सवाल है।

प्रोजेक्ट ने ही जोशीमठ की यह दुर्दशा की: Joshimath Badrinath

  • सरकारी विभागों और कॉरपोरेट्स के महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट ने ही जोशीमठ की यह दुर्दशा की है।
  • 2013 में केदारनाथ में आई तबाही की यादें अभी धुंधली नहीं हुई है.
  • लेकिन एक के बाद एक घटनाएं लगातार यह संकेत दे रही है.
  • कि उत्तराखंड की नाजुक चट्टानें इस तरह की विशाल परियोजनाओं का भार झेलने में सक्षम नहीं है।

मतलब यह साफ है कि केवल इंसान ही नहीं सरकारी संस्थाओं को प्रकृति को भी मुआवजा देना चाहिए जिसके लिए जोशीमठ और अन्य स्थानों पर पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई के लिए बड़े कदम उठाए जाने चाहिए तब जाकर कहीं इस तबाही के मंजर में तब्दीली आ सकती है वरना हाथ पर हाथ धरे भविष्यवाणियों पर भरोसा करना ही इन विरासतों की किस्मत रह जाएगी ।
और हमारे लिए बच जाएंगे बस यादें किसी उत्तराखंड केदारनाथ और जोशीमठ की।

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