India Newsराजस्थान

Swami Vivekananda: खेतड़ी के राजा अजीत और स्वामी विवेकानन्द

Swami Vivekananda: खेतड़ी के राजा अजीत और स्वामी विवेकानन्द

Swami Vivekananda: राजस्थान के झुंझुनू जिले के खेतड़ी नरेश राजा अजीतसिंह धार्मिक और आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले शासक थे।

  • गर्मी के दिनों में राजा अजीतसिंह माउंट आबू स्थित अपने खेतड़ी महल में थे।
  • उसी दौरान 4 जून, 1891 को युवा संन्यासी विवेकानन्द से उनकी पहली बार मुलाकात हुई।
  • इस मुलाकात में अजीतसिंह उस युवा संन्यासी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे अपना गुरु बना लिया.
  • और अपने साथ खेतड़ी चलने का आग्रह किया।
  • स्वामी विवेकानन्द 7 अगस्त, 1891 को पहली बार खेतड़ी पहुंचे।
  • खेतड़ी में विवेकानन्द 27 अक्टूबर, 1891 तक रहे।
  • यहीं स्वामी विवेकानन्द ने राज पण्डित नारायणदास शास्त्री के सहयोग से पाणिनी का ’अष्टाध्यायी’ व पातंजलि का ’महाभाष्याधायी’ का अध्ययन किया।
  • स्वामीजी ने व्याकरणाचार्य और पाण्डित्य के लिए विख्यात नारायणदास शास्त्री को लिखे पत्रों में उन्हें मेरे गुरु कहकर सम्बोधित किया है।

स्वामीजी फतेहविलास महल में बैठे: Swami Vivekananda

अमेरिका जाने से पूर्व 21 अप्रैल, 1893 को स्वामी विवेकानंद दूसरी बार खेतड़ी पहुंचे। इस बार वह 10 मई, 1893 तक खेतड़ी में ठहरे। इस दौरान एक दिन राजा अजीत सिंह और स्वामीजी फतेहविलास महल में बैठे शास्त्र चर्चा कर रहे थे। तभी राज्य की नर्तकियों ने वहां आकर गायन वादन का अनुरोध किया। इस पर संन्यासी होने के नाते स्वामीजी उठकर जाने लगे। नर्तकियों की दल नायिका मैनाबाई ने स्वामी जी से आग्रह किया कि वो विराजें। उन्हें वो भजन सुनाएगी। मैनाबाई ने महाकवि सूरदास रचित प्रसिद्ध भजन ’’प्रभु मोरे अवगुण चित न धरो, समदरसी है नाम तिहारो चाहे तो पार करो…’ सुनाया। इस सुनकर स्वामीजी की आंखों में आंसुओं की धारा बह निकली। उन्होंने उस पतिता नारी को ’ ज्ञानदायिनी मां ’ कहकर सम्बोधित किया और कहा कि आपने आज मेरी आंखें खोल दी हैं।

स्वामीजी संन्यासोन्मुखी

  • इस भजन को सुनकर ही स्वामीजी संन्यासोन्मुखी हुए।
  • 10 मई, 1893 को स्वामीजी ने मात्र 28 वर्ष की अल्पायु में खेतड़ी से अमेरिका जाने को प्रस्थान किया।
  • महाराजा अजीतसिंह के आर्थिक सहयोग से ही स्वामी विवेकानन्द अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्वधर्म सम्मेलन में शामिल हो वेदान्त की पताका फहराकर भारत को विश्व धर्मगुरु का सम्मान दिलाया।
  • अमेरिका जाते वक्त खेतड़ी नरेश राजा अजीतसिंह ने अपने मुंशी जगमोहन लाल व अन्य कर्मचारियों को बम्बई तक स्वामी जी की यात्रा की तैयारियों व व्यवस्था करने के लिए भेजा था।
  • इस बात की बहुत कम लोगों को जानकारी है कि स्वामीजी का स्वामी विवेकानन्द नाम भी राजा अजीतसिंह ने रखा था।
  • इससे पूर्व स्वामीजी का नाम विविदिषानन्द था।
  • शिकागो जाने से पूर्व राजा अजीतसिंह ने स्वामीजी से कहा आपका नाम बड़ा कठिन है।
  • उसका अर्थ नहीं समझा जा सकता है।
  • उसी दिन राजा अजीतसिंह ने उनके सिर पर भगवा साफा बांधा व भगवा चोगा पहना कर नया वेश व नया नाम स्वामी विवेकानन्द प्रदान किया.
  • जिसे स्वामीजी ने जीवन पर्यन्त धारण किया।

हिन्दू धर्म: Swami Vivekananda

शिकागो में हिन्दू धर्म की पताका फहराकर स्वामीजी विश्व भ्रमण करते हुए 1897 में जब भारत लौटे तो 17 दिसम्बर, 1897 को खेतड़ी नरेश ने स्वामीजी के सम्मान में 12 मील दूर जाकर उनका स्वागत किया व भव्य गाजे-बाजे के साथ खेतड़ी लेकर आए। उस वक्त स्वामी जी को सम्मान स्वरूप खेतड़ी दरबार के सभी ओहदेदारों ने दो-दो सिक्के भेंट किए व खेतड़ी नरेश ने तीन हजार सिक्के भेंट कर दरबार हाल में स्वामी जी का स्वागत किया। उनके स्वागत में पूरे खेतड़ी में चालीस मण (सोलह सौ किलो) देशी घी के दीपक जलवाए थे। इससे भोपालगढ़, फतेहसिंह महल, जयनिवास महल के साथ पूरा शहर खेतड़ी जगमगा उठा था।

खेतड़ी के पन्नालाल शाह

  • 20 दिसम्बर, 1897 को खेतड़ी के पन्नालाल शाह तालाब पर प्रीतिभोज देकर स्वामी जी का भव्य स्वागत किया गया ।
  • शाही भोज में उस वक्त खेतड़ी ठिकाना के पांच हजार लोगों ने भाग लिया था।
  • उसी समारोह में स्वामी विवेकानन्द ने खेतड़ी में सावजनिक रूप से भाषण दिया।
  • भाषण सुनने वालों में खेतड़ी नरेश अजीत सिंह के साथ काफी संख्या में विदेशी राजनयिक भी शामिल हुए थे।
  • 21 दिसम्बर, 1897 को स्वामीजी खेतड़ी से प्रस्थान कर गए। यह स्वामीजी का अन्तिम खेतड़ी यात्रा थी।
  • स्वामी विवेकानन्द ने एक स्थान पर स्वीकार किया था कि यदि खेतड़ी के राजा अजीतसिंह से उनकी भेंट नहीं हुई होती.
  • तो भारत की उन्नति के लिए उनके द्वारा जो थोड़ा बहुत प्रयास किया गया उसे वे कभी नहीं कर पाते।
  • स्वामी जी, राजा अजीत सिंह को समय-समय पर पत्र लिखकर जनहित कार्य जारी रखने की प्रेरणा देते रहते थे।
  • स्वामी विवेकानन्द ने ही राजा अजीत सिंह को खगोल विज्ञान की शिक्षा दी थी।
  • उन्होंने खेतड़ी के संस्कृत विद्यालय में अष्ठाध्यायी ग्रंथों का अध्ययन भी किया था।
  • स्वामी विवेकानन्द के कहने पर ही राजा अजीतसिंह ने खेतड़ी में शिक्षा के प्रसार के लिए जयसिंह स्कूल की स्थापना की थी।

राजा अजीतसिंह

राजा अजीतसिंह और स्वामी विवेकानन्द के अटूट सम्बन्धों की अनेक कथाएं आज भी खेतड़ी के लोगों की जुबान पर सहज ही सुनने को मिल जाती हैं। स्वामीजी का मानना था कि यदि राजा अजीतसिंह नहीं मिलते तो उनका शिकागो जाना संभव नहीं होता। स्वामी जी का जन्म 12 जनवरी, 1863 में व मृत्यु 4 जुलाई 1902 को हुई थी। इसी तरह राजा अजीतसिंह जी का जन्म 10 अक्टूबर 1861 और मृत्यु 18 जनवरी 1901 को हुई थी। दोनों का निधन 39 वर्ष की आयु में हो गया था व दोनों के जन्म व मृत्यु का समय में भी ज्यादा अन्तर नहीं था। इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता है।

स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन: Swami Vivekananda

  • स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन 12 जनवरी को ही राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
  • राष्ट्रीय युवा दिवस मनाए जाने का प्रमुख कारण उनका दर्शन, सिद्धांत, आध्यात्मिक विचार और उनके आदर्श है।
  • जिनका उन्होंने स्वयं पालन किया और भारत के साथ-साथ अन्य देशों में भी उन्हें स्थापित किया।
  • स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशन नामक सेवा भावी संगठन की स्थापना की थी।
  • उसकी पहली शाखा खेतड़ी में 1958 में खोली थी।
  • खेतड़ी में रामकृष्ण मिशन ने करोड़ों रुपये की लागत से स्वामी विवेकानन्द राष्ट्रीय संग्रहालय बनवाया है।
  • यह देश का पांचवां और राजस्थान का पहला संग्रहालय है।

Show More

Related Articles

Back to top button